रायपुर: सत्ता से बाहर होने के बाद छत्तीसगढ़ कांग्रेस के सामने सबसे बड़ी चुनौती संगठन को दोबारा खड़ा करने की थी।लेकिन हालात बताते हैं कि पार्टी की मुश्किलें बाहर नहीं, भीतर ज्यादा गहरी होती जा रही हैं। एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार प्रदेश अध्यक्ष दीपक बैज को बने ढाई साल से अधिक का वक्त बीत चुका है, लेकिन अब तक पूरी प्रदेश कार्यकारिणी का गठन नहीं हो पाया है।
सत्ता नहीं, संगठन की कमी बड़ी परेशानी
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, कांग्रेस संगठन में गुटबाजी, नेतृत्व को लेकर असहजता और फैसलों में देरी खुलकर सामने आ रही है। इसका असर पार्टी की विपक्षी भूमिका पर भी दिख रहा है। विधानसभा से लेकर सड़क तक कांग्रेस की धार कमजोर नजर आ रही है।
ढाई साल में भी पूरी टीम क्यों नहीं
प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद दीपक बैज से उम्मीद थी कि वह संगठन को नए सिरे से मजबूत करेंगे। लेकिन कार्यकारिणी के अधूरे गठन ने इन उम्मीदों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। पार्टी के अंदर ही यह चर्चा तेज है कि जब पूरी टीम ही तय नहीं, तो जिम्मेदारी और जवाबदेही कैसे तय होगी।
भाजपा का हमला, “अध्यक्ष सिर्फ नाम के”
इस मुद्दे पर भाजपा ने कांग्रेस को घेर लिया है। भाजपा प्रदेश प्रवक्ता देवलाल ठाकुर का कहना है कि दीपक बैज को जानबूझकर मजबूत नहीं होने दिया जा रहा। उन्होंने पाटन में कांग्रेस नेता रविंद्र चौबे के उस बयान का जिक्र किया, जिसमें कहा गया था कि अगला चुनाव भूपेश बघेल के नेतृत्व में लड़ा जाएगा। भाजपा का सवाल है कि जब नेतृत्व पहले से तय है, तो प्रदेश अध्यक्ष की भूमिका क्या रह जाती है।
दिल्ली से चल रहा कांग्रेस संगठन
भाजपा का आरोप है कि एक आदिवासी चेहरे को प्रदेश अध्यक्ष बनाकर केवल प्रतीकात्मक संतुलन साधा गया है। असली फैसले आज भी दिल्ली से लिए जा रहे हैं। भाजपा के मुताबिक, इससे प्रदेश संगठन कमजोर हो रहा है और जमीनी कार्यकर्ता असमंजस में हैं।
कांग्रेस का पलटवार, भाजपा पर ही सवाल
कांग्रेस ने भाजपा के आरोपों को खारिज किया है। कांग्रेस प्रदेश प्रवक्ता धनंजय सिंह ठाकुर का कहना है कि भाजपा खुद संगठनात्मक भ्रम की स्थिति में है। उन्होंने दावा किया कि भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष अस्थायी है और प्रदेश अध्यक्ष सरकार और संगठन दोनों जगह प्रभावहीन हैं।
सड़क पर आंदोलन, लेकिन असर कितना
कांग्रेस का कहना है कि दीपक बैज के नेतृत्व में पार्टी साय सरकार के कुशासन, किसान विरोधी नीतियों, युवाओं से रोजगार छीनने और मनरेगा को कमजोर करने के खिलाफ लगातार आंदोलन कर रही है। हालांकि, राजनीतिक जानकार मानते हैं कि आंदोलनों की आक्रामकता और जमीनी पकड़ पहले जैसी नहीं दिख रही।
कार्यकारिणी पर सफाई, सवाल फिर भी बाकी
कांग्रेस का तर्क है कि प्रदेश कार्यकारिणी बनी हुई है और केवल कुछ पद रिक्त हैं। पार्टी का कहना है कि संगठन में तीन साल का कार्यकाल होता है और समय-समय पर जिम्मेदारियां बदली जाती हैं। लेकिन सवाल यह है कि ढाई साल बाद भी ये रिक्तियां क्यों बनी हुई हैं।
“बिना टीम के कप्तान क्या करेगा”
एक मीडिया रिपोर्ट में वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक उचित शर्मा कहते हैं कि ढाई साल बहुत लंबा वक्त होता है। इस दौरान चुनाव, आंदोलन और मुद्दों की राजनीति होती है। अगर पूरी टीम ही नहीं है, तो कप्तान अकेले क्या लड़ेगा। उनके मुताबिक, संगठन को ब्लॉक, बूथ और बीएलए स्तर तक मजबूत होना चाहिए।
अब सवाल विपक्ष की भूमिका पर
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि संगठन की कमजोरी का सीधा असर विपक्ष की धार पर पड़ता है। अगर कांग्रेस अंदरूनी तौर पर ही उलझी रही, तो सरकार से सवाल पूछने की जिम्मेदारी कौन निभाएगा। अब बड़ा सवाल यही है कि क्या कांग्रेस समय रहते अपने संगठन को संभाल पाएगी या यह अंदरूनी संकट और गहराएगा।












