जगदलपुर: बस्तर की सांस्कृतिक विरासत को सहेजने के लिए आयोजित ‘संभाग स्तरीय बस्तर पंडुम’ का शनिवार को भव्य शुभारंभ हुआ। इस ऐतिहासिक अवसर पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुईं। उन्होंने बस्तर की आराध्य देवी मां दंतेश्वरी के जयघोष के साथ अपने संबोधन की शुरुआत की और जनजातीय परंपराओं की जमकर तारीफ की।
“आदिवासी संस्कृति ही छत्तीसगढ़ की पहचान”
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने कहा कि छत्तीसगढ़ की आत्मा यहां की आदिवासी संस्कृति में बसती है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, उन्होंने बस्तर पंडुम को जनजातीय गौरव का प्रतीक बताया और कहा कि छत्तीसगढ़ सरकार आदिवासियों की प्राचीन विरासत को संरक्षित करने के लिए सराहनीय काम कर रही है। राष्ट्रपति ने जोर दिया कि पीएम जनमन और नियद नेल्लानार जैसी योजनाओं से दुर्गम इलाकों तक विकास पहुँच रहा है।
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बस्तर में अब ‘शांति का सूर्योदय’
माओवाद के मुद्दे पर राष्ट्रपति ने कहा कि बस्तर में अब सकारात्मक बदलाव दिख रहा है। लोग हिंसा छोड़कर मुख्यधारा में लौट रहे हैं और वर्षों से बंद पड़े स्कूल फिर से खुल रहे हैं। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र के प्रति लोगों का विश्वास बढ़ा है और अब सड़क, बिजली व पानी जैसी बुनियादी सुविधाएं अंतिम छोर तक पहुँच रही हैं।
मुख्यमंत्री का संकल्प: 2026 तक नक्सलवाद का अंत
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कार्यक्रम में कहा कि जहां कभी गोलियों की आवाज गूंजती थी, आज वहां स्कूलों की घंटी सुनाई देती है। उन्होंने बड़ा दावा करते हुए कहा कि सरकार ने 31 मार्च 2026 तक नक्सलवाद के समूल उन्मूलन का लक्ष्य तय किया है। सीएम ने कहा कि राष्ट्रपति का यहां आना पूरे आदिवासी समाज के लिए बड़े सम्मान की बात है।
54 हजार कलाकारों ने कराया पंजीयन
बस्तर पंडुम की भव्यता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि इसमें 54 हजार से अधिक आदिवासी कलाकारों ने अपना रजिस्ट्रेशन कराया है। राज्यपाल रमेन डेका ने इस आयोजन को लोकसंस्कृति का उत्सव बताया। उन्होंने ढोकरा शिल्प और बस्तर के पारंपरिक नृत्यों जैसे गौर, परघौनी और मुरिया नृत्य को नई पीढ़ी से जोड़ने का सशक्त माध्यम करार दिया।
गौर नृत्य ने बांधा समां
शुभारंभ अवसर पर बस्तानार के युवाओं द्वारा प्रस्तुत विश्व-प्रसिद्ध ‘गौर नृत्य’ ने राष्ट्रपति समेत सभी आगंतुकों को मंत्रमुग्ध कर दिया। पारंपरिक वेशभूषा और ढोल की थाप पर हुई इस प्रस्तुति ने बस्तर की आदिम संस्कृति को जीवंत कर दिया।
इस महोत्सव के जरिए बस्तर की कला और संस्कृति को न केवल राष्ट्रीय बल्कि वैश्विक मंच पर पहचान दिलाने की कोशिश की जा रही है।








