छत्तीसगढ़ के दुर्ग में पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के बेटे चैतन्य बघेल को जमानत मिलने के बाद राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने उनकी रिहाई पर स्वागत किया, वहीं जेसीसी (जे) के अध्यक्ष अमित जोगी ने पूरे मामले को “जेल और बेल के बीच का राजनीतिक खेल” बताया।
चैतन्य बघेल की रिहाई के बाद कांग्रेस नेताओं और कार्यकर्ताओं ने खुशी जाहिर की। भूपेश बघेल ने इसे राहत की खबर बताया, जबकि चैतन्य बघेल ने अपनी रिहाई को न्याय की जीत कहा। वहीं इस पूरे मामले को लेकर अमित जोगी ने कहा
कि आजकल अखबार खोलते ही जेल और बेल की खबरें दिखती हैं, लेकिन असली मुद्दा यह है कि इनके बीच जो राजनीतिक खेल चल रहा है, उस पर चर्चा क्यों नहीं होती।
गिरफ्तारी पर पहले भी जताई थी आपत्ति?
अमित जोगी ने कहा कि चैतन्य बघेल की गिरफ्तारी के समय भी उन्होंने साफ कहा था कि राजनीति को इतना नीचे नहीं गिराना चाहिए कि विरोध का बदला परिवार से लिया जाए।उनका कहना था कि मतभेद राजनीति में हों, न कि बेटे, पत्नी या परिवार के अन्य सदस्यों को निशाना बनाया जाए।
अमित जोगी ने कहा,
“जेल और बेल का राजनीतिक खेल छत्तीसगढ़ में चल रहा है। पूरा मामला कोर्ट में है, इसलिए मैं ज्यादा कुछ नहीं कहूंगा। लेकिन इतना तय है कि केंद्रीय जांच एजेंसियों का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए किया जा रहा है, विपक्ष को दबाने के लिए।” उन्होंने यह भी कहा कि अपने राजनीतिक फायदे के लिए किसी के परिवार को निशाना बनाना गलत है।
केंद्रीय एजेंसियों पर क्या आरोप लगे?
जोगी ने दावा किया कि सीबीआई, ईडी और अन्य एजेंसियों का दुरुपयोग हो रहा है। उनका आरोप है कि इन एजेंसियों का इस्तेमाल उन लोगों के खिलाफ किया जा रहा है, जिन्होंने मौजूदा सरकार को वोट नहीं दिया। अमित जोगी ने कहा कि उनके अनुसार करीब 60 प्रतिशत जनता सत्ता पक्ष से सहमत नहीं है।
कोर्ट के फैसले पर जोगी का रुख
अमित जोगी ने कहा कि उच्च न्यायालय के फैसले के बाद बघेल परिवार का खुश होना स्वाभाविक है और उन्हें इसके लिए बधाई। साथ ही उन्होंने कहा कि यह न्यायालय का विषय है, इसलिए इस पर ज्यादा टिप्पणी करना उचित नहीं, लेकिन लोकतंत्र में संस्थाओं की निष्पक्षता बेहद जरूरी है।
विकास बनाम बदले की राजनीति
अमित जोगी ने कहा कि राजनीति को बदले की भावना से बाहर निकलना चाहिए। उनके मुताबिक रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और विकास जैसे मुद्दों पर बात होनी चाहिए, न कि केवल जांच एजेंसियों और कानूनी कार्रवाइयों के इर्द-गिर्द राजनीति सिमट जाए। अब सवाल ये है कि चैतन्य बघेल की जमानत के बाद उठे ये सवाल क्या छत्तीसगढ़ की राजनीति में नई बहस को जन्म देंगे और क्या “जेल और बेल” से आगे बढ़कर राजनीति जनहित के मुद्दों पर लौटेगी, या यह सियासी टकराव यूं ही चलता रहेगा।







