दंतेवाड़ा: बस्तर की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक ‘विश्व प्रसिद्ध फागुन मेला 2026’ इन दिनों अपनी पूरी भव्यता के साथ जारी है। 10 दिनों तक चलने वाले इस उत्सव के दौरान आज एक ऐतिहासिक दृश्य देखने को मिला, जब बस्तर राजपरिवार के महाराजा कमलचंद्र भंजदेव 1100 से अधिक स्थानीय देवी-देवताओं की पालकियों के साथ नगर भ्रमण पर निकले। 22 फरवरी से शुरू हुआ यह मेला होली के अगले दिन यानी 5 मार्च 2026 तक चलेगा।
रंग-भंग और पौधों की पूजा से हुई शुरुआत
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, मेले के मुख्य चरण का आगाज़ ‘रंग-भंग’ की रस्म और पौधों की विशेष पूजा के साथ हुआ। परंपरा के मुताबिक, सबसे पहले शक्तिपीठ मां दंतेश्वरी की अनुमति लेकर विधि-विधान से पूजा की गई। इसके बाद शाम 4 बजे से देवी-देवताओं की पालकियों का नगर भ्रमण शुरू हुआ। इस दौरान पूरा शहर ढोल-नगाड़ों की गूंज और ‘माई जी’ के जयकारों से सराबोर रहा।
महाराजा ने निभाईं रियासतकालीन रस्में
बस्तर के महाराजा कमलचंद्र भंजदेव ने खुद उपस्थित रहकर रियासतकालीन परंपराओं का निर्वहन किया। उन्होंने मां दंतेश्वरी के समक्ष शीश नवाकर बस्तर की सुख-समृद्धि और शांति की कामना की। नगर भ्रमण के दौरान शहर में कई स्थानों पर श्रद्धालुओं के लिए विशेष व्यवस्था की गई थी, जहां लोगों ने कतारबद्ध होकर देवी-देवताओं के विग्रहों का आशीर्वाद लिया।
गार्ड ऑफ ऑनर के साथ निकली माता की डोली
फागुन मेले का सबसे प्रमुख आकर्षण मां दंतेश्वरी की डोली यात्रा रही। सदियों पुरानी इस परंपरा के सम्मान में पुलिस के जवानों ने माता को ‘गार्ड ऑफ ऑनर’ दिया। यह क्षण श्रद्धा और गौरव का अद्भुत संगम रहा, जिसे देखने के लिए बस्तर संभाग ही नहीं, बल्कि पड़ोसी राज्यों से भी हजारों श्रद्धालु दंतेवाड़ा पहुंचे हैं।
10 दिनों तक चलने वाले अनुष्ठान
प्रारंभ: 22 फरवरी को कलश स्थापना के साथ।
प्रतिदिन की रस्में: मंदिर परिसर में अलग-अलग जनजातीय अनुष्ठान और नृत्य।
प्रमुख अतिथि: नारायणपुर से मावली माता (दंतेश्वरी माता की बहन) और राकेडा माता का आगमन।
समापन: 5 मार्च को होलिका दहन और देवी-देवताओं की सम्मानपूर्वक विदाई के साथ।
आदिवासी संस्कृति और ग्राम देवताओं का संगम
इस मेले की खासियत यह है कि इसमें बस्तर के दूरस्थ अंचलों से ग्राम देवता अपने पारंपरिक प्रतीकों (लाठ, बैरंग और छतर) के साथ शामिल होते हैं। इस वर्ष हालांकि देवी-देवताओं की संख्या पिछले साल (1200) के मुकाबले लगभग 1100 रही, लेकिन भक्तों के उत्साह में कोई कमी नहीं दिखी। बस्तर की आदिम संस्कृति को करीब से देखने के लिए यह मेला देश-विदेश के पर्यटकों के लिए भी आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।









