रायपुर: ‘ छत्तीसगढ़ के कथित शराब घोटाला मामले में जमानत पर रिहा हुए पूर्व आबकारी मंत्री और कांग्रेस विधायक कवासी लखमा सोमवार को एक साल बाद विधानसभा की कार्यवाही में शामिल हुए। सदन में पहुंचते ही लखमा ने दलगत राजनीति से ऊपर उठकर सत्ता पक्ष और विपक्ष के नेताओं से मुलाकात की, जिसने सबका ध्यान अपनी ओर खींचा।
सत्ता पक्ष के नेताओं से आत्मीय मुलाकात
सदन के भीतर एक दुर्लभ नजारा देखने को मिला जब कवासी लखमा सीधे भाजपा खेमे की ओर चले गए। उन्होंने कैबिनेट मंत्री रामविचार नेताम को गले लगाया और वरिष्ठ भाजपा विधायक अजय चंद्राकर से भी गर्मजोशी के साथ हाथ मिलाया। पक्ष-विपक्ष के बीच इस आत्मीयता को देखकर सदन में मौजूद अन्य सदस्य भी हैरान रह गए।
“लखमा हम सबके ‘दादी’ हैं”
कृषि मंत्री रामविचार नेताम ने कवासी लखमा का स्वागत करते हुए उन्हें ‘दादी’ (बस्तर में बड़ों के लिए सम्मानजनक संबोधन) कहकर संबोधित किया। नेताम ने कहा कि सदन में उनकी कमी लंबे समय से खल रही थी। उन्होंने जोर देकर कहा कि लखमा का सम्मान पूरा सदन करता है और उनकी वापसी से लोकतांत्रिक चर्चाओं में फिर से जीवंतता आएगी।
इन शर्तों पर मिली सदन में बैठने की अनुमति
- विधानसभा अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह ने कुछ विशेष और कड़ी शर्तों के साथ लखमा को बजट सत्र में शामिल होने की अनुमति दी है:
- नो स्पीच नियम: लखमा सदन के अंदर किसी भी विषय पर भाषण नहीं दे सकेंगे।
- चर्चा पर रोक: वह विधानसभा के अंदर या बाहर चल रही ‘गुण-दोष’ की चर्चा में भाग नहीं लेंगे।
- सीमित उपस्थिति: उनकी उपस्थिति केवल वर्तमान बजट सत्र के चलने तक ही मान्य रहेगी।
- अनुमति रद्दीकरण: यदि इन शर्तों का उल्लंघन होता है, तो उनकी अनुमति तत्काल रद्द की जा सकती है।
सुप्रीम कोर्ट से मिली है जमानत
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, कवासी लखमा को 25 जनवरी 2025 को शराब घोटाले में ईडी (ED) ने गिरफ्तार किया था। साल भर जेल में रहने और कई बार याचिकाएं खारिज होने के बाद, अंततः 3 फरवरी को सुप्रीम कोर्ट से उन्हें जमानत मिली। इसके बाद उन्होंने 6 फरवरी को विधानसभा अध्यक्ष से सत्र में शामिल होने का अनुरोध किया था, जिस पर महाधिवक्ता की कानूनी राय लेने के बाद फैसला सुनाया गया।
अध्यक्ष के विवेक पर था फैसला
लखमा की सदन में भागीदारी का मामला कानूनी पेचीदगियों में फंसा था। अदालत ने इस पर अंतिम निर्णय विधानसभा अध्यक्ष के विवेक पर छोड़ दिया था। अध्यक्ष डॉ. रमन सिंह ने लोकतांत्रिक परंपराओं और कानूनी अभिमत को ध्यान में रखते हुए उन्हें शर्तों के साथ सदन की कार्यवाही देखने और उपस्थित रहने की इजाजत दी।
कवासी लखमा की वापसी के बाद अब बस्तर की राजनीति और विधानसभा की आगामी कार्यवाहियों पर राजनीतिक विश्लेषकों की पैनी नजर है।








