रायपुर: सुबह ब्रश कर रहे थे। कोई बीमारी नहीं, कोई चेतावनी नहीं। लेकिन कुछ ही मिनटों में डॉक्टर कह रहे थे — “अगर ज़रा सी भी चूक हुई, तो ये इंसान या तो ब्रेन डेड होगा या हमेशा के लिए लकवाग्रस्त।” (यह कहानी डॉक्टर और पीड़ित परिवार के बयान और मीडिया रिपोर्ट्स पर आधारित है)
एक आम सुबह, जो किसी को डराती नहीं
1 दिसंबर की सुबह थी, करीब 9:30 बजे रायपुर का एक 40 साल का आम आदमी, रोज़ की तरह ब्रश कर रहा था। घर में पत्नी थी, तीन बच्चे भी। ना कोई बीमारी, ना कोई इलाज चल रहा था। ज़िंदगी बिल्कुल नॉर्मल चल रही थी।
अचानक उठा ऐसा दर्द, जिसने सब कुछ बदल दिया
ब्रश करते-करते अचानक उनके गले में तेज दर्द उठा। पहले लगा शायद सामान्य दर्द होगा, लेकिन कुछ ही सेकंड में गला तेजी से सूजने लगा। दर्द बढ़ता चला गया और घबराहट भी।परिवार को समझ आ गया कि मामला कुछ और ही है।
जब घर से अस्पताल तक का रास्ता सबसे लंबा लगा
बिना समय गंवाए परिवार ने उन्हें स्कूटी पर बैठाया और सीधे रायपुर के मेकाहारा सरकारी अस्पताल लेकर पहुंचे। हर मिनट भारी पड़ रहा था। कोई नहीं जानता था कि अंदर क्या चल रहा है।
डॉक्टरों ने देखा और सन्नाटा छा गया
मेकाहारा पहुंचते ही डॉ. कृष्णकांत साहू और उनकी टीम ने जांच शुरू की। कुछ ही देर में जो रिपोर्ट सामने आई वो किसी के भी होश उड़ाने के लिए काफी थी। डॉक्टर के मुताबिक, मरीज के गले की वो नस फट चुकी थी जो दिल से दिमाग तक खून पहुंचाने का काम करती है। नस गुब्बारे की तरह फूल गई थी और पूरे गले में खून के थक्के जम चुके थे।
ऑपरेशन ही एक रास्ता था, लेकिन रास्ता मौत से भरा था
डॉक्टरों के सामने सिर्फ एक विकल्प था — तुरंत ऑपरेशन, लेकिन ये ऑपरेशन बेहद हाई-रिस्क था। इतना खतरनाक कि ऑपरेशन टेबल पर मरीज की जान जा सकती थी,
या वो ब्रेन डेड हो सकता था या जिंदगी भर के लिए लकवाग्रस्त।
एक कागज़, जिस पर साइन करते वक्त हाथ कांपते हैं
ऐसे हालात में परिवार से लिखित सहमति ली जाती है।
एक फाइल आगे बढ़ाई गई, जिसमें साफ लिखा था —
ऑपरेशन के दौरान मरीज की मौत हो सकती है।
मरीज की पत्नी लक्ष्मी दीदी,
जो तीन बच्चों की मां हैं,
कागज़ देखते ही सन्न रह गईं।
जब डर के आगे भरोसे ने कदम रखा
हाथ कांप रहे थे।
आंखों में डर साफ दिख रहा था।
लेकिन हालात ऐसे थे
जहां पीछे हटने का कोई रास्ता नहीं था।
लक्ष्मी दीदी ने साइन किए और कहा —
“जो ऊपर वाले ने तय किया होगा, वही होगा…
आप इलाज शुरू कीजिए।”
ऑपरेशन टेबल पर सबसे बड़ी मुश्किल सामने आई
ऑपरेशन शुरू हुआ। लेकिन मुश्किल यहीं खत्म नहीं हुई।
पूरा गला खून के थक्कों से भरा था। फटी हुई नस साफ दिखाई ही नहीं दे रही थी। डॉक्टरों को पहले नस ढूंढनी थी,
फिर उसे रिपेयर करना था।
डेढ़ घंटे सिर्फ तलाश में, एक गलती और सब खत्म
करीब डेढ़ घंटे तक
डॉक्टर सिर्फ नस ढूंढते ही रहे।
डॉ. कृष्णकांत साहू के मुताबिक,
इस दौरान अगर ज़रा सी भी गलती हो जाती,
तो मरीज या तो ब्रेन डेड हो सकता था
या फिर उसे जिंदगी भर के लिए लकवा मार सकता था।
पांच से छह घंटे, जब हर सेकंड भारी था
आखिरकार वो नस मिल गई। इसके बाद करीब 5 से 6 घंटे तक
लगातार हाई-रिस्क ऑपरेशन चला। हर मूवमेंट नपी-तुली थी।
कोई दूसरा मौका नहीं था।
जब डॉक्टरों ने वो कर दिखाया, जो पहले कभी नहीं हुआ
ऑपरेशन सफल रहा। मरीज की जान बच गई।
डॉक्टर साहब की स्टडी के मुताबिक,
दुनिया भर में इस तरह के सिर्फ 10 ही मामले सामने आए हैं।
और ये केस ना सिर्फ छत्तीसगढ़ में बल्कि देश में भी पहली बार माना जा रहा है।
दो दिन बाद जो हुआ, उस पर यकीन करना मुश्किल था
ऑपरेशन के सिर्फ दो दिन बाद मरीज ऐसे चलने-फिरने लगे
जैसे उन्हें कुछ हुआ ही न हो। पत्नी लक्ष्मी दीदी कहती हैं,
“दो दिन बाद तो ऐसा लग रहा था
जैसे कोई बड़ी सर्जरी हुई ही नहीं।”
सरकारी अस्पतालों पर सवाल, लेकिन इस कहानी से एक उम्मीद
छत्तीसगढ़ के सरकारी अस्पतालों पर इलाज में लापरवाही के आरोप अक्सर लगते रहे हैं। सवाल उठते हैं और उठने भी चाहिए। लेकिन मेकाहारा में हुई इस सफल सर्जरी की कहानी
ये भी दिखाती है कि अगर सिस्टम में जिम्मेदारी और नीयत हो,
तो सरकारी अस्पताल जिंदगी भी बचा सकते हैं।
अंत में सिर्फ एक सवाल, जिसका जवाब सिस्टम को देना है
इस कहानी ने उम्मीद तो जगा दी है लेकिन असली सवाल अब भी बाकी है —
क्या ऐसा इलाज
प्रदेश के हर सरकारी अस्पताल में
हर मरीज को मिल पाएगा?

















