दंतेवाड़ा: बस्तर के वनांचल [Forest Area – जंगलों वाला इलाका] से एक ऐसी खबर आई है जिसने पूरे छत्तीसगढ़ का सीना गर्व से चौड़ा कर दिया है। दंतेवाड़ा जिले के छोटे से गांव हीरानार की रहने वाली सामाजिक कार्यकर्ता बुधरी ताती को भारत सरकार ने पद्मश्री पुरस्कार के लिए चुना है। यह सम्मान उनके दशकों लंबे संघर्ष और निस्वार्थ सेवा का प्रतिफल [Result – फल] है।
1986 से शुरू हुआ बदलाव का सफर
बुधरी ताती की कहानी साल 1986 में शुरू हुई, जब बस्तर में शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएं न के बराबर थीं। कठिन भौगोलिक परिस्थितियों [Geographical Conditions – इलाके की बनावट जैसे पहाड़, जंगल] और संसाधनों की कमी के बावजूद, उन्होंने आदिवासियों को शिक्षा से जोड़ने का बीड़ा उठाया।
महिला सशक्तिकरण का ‘बस्तर मॉडल’
बुधरी जी ने केवल महिलाओं को अधिकारों का पाठ नहीं पढ़ाया, बल्कि उन्हें आर्थिक रूप से आजाद बनाया:
बचत और समूह: उन्होंने हजारों महिलाओं को समूहों से जोड़ा और उनमें बचत की आदत डाली।
आत्मनिर्भरता: स्वरोजगार [Self-employment – अपना खुद का काम] के जरिए महिलाओं को पैरों पर खड़ा किया, जिससे वे आज घर के बड़े फैसले खुद ले पा रही हैं।
बदलाव: उनके प्रयासों का ही असर है कि आज नक्सल प्रभावित इलाकों की महिलाएं आत्मविश्वास के साथ सरकारी योजनाओं का लाभ ले रही हैं।
नशे के खिलाफ छेड़ी जंग
बस्तर के परिवारों को टूटने से बचाने के लिए बुधरी ताती ने नशामुक्ति [Addiction-free – नशा छोड़ने की मुहिम] को अपना लक्ष्य बनाया। उन्होंने गांव-गांव जाकर परिवारों को नशे के दुष्परिणाम [Bad Effects – बुरा प्रभाव] समझाए। उनकी इस मुहिम से अनगिनत परिवारों में खुशहाली वापस लौटी और समाज में एक सकारात्मक बदलाव आया।
“बस्तर का दर्द मेरा अपना है”
पद्मश्री के लिए चयनित होने पर बुधरी ताती ने भावुक होकर कहा कि उन्होंने वह दौर देखा है जब परिस्थितियां बहुत चुनौतीपूर्ण थीं। उन्होंने ठान लिया था कि बस्तर की महिलाओं को उनका हक दिलाकर रहेंगी और आज उनकी यही जिद एक बड़े आंदोलन का रूप ले चुकी है।
जमीनी संघर्ष की जीत
यह पुरस्कार केवल बुधरी ताती का नहीं, बल्कि उन तमाम वनवासी समुदायों का सम्मान है जिन्होंने उन पर भरोसा किया। उनकी कहानी सिखाती है कि अगर इरादे फौलादी हों, तो सबसे दुर्गम [Hard to reach – जहां पहुंचना कठिन हो] इलाकों में भी विकास का सूरज उगाया जा सकता है।







