रायपुर/अंबिकापुर: क्या अपनी मातृभाषा में बात करना किसी बच्चे के भविष्य के रास्ते बंद कर सकता है? क्या सरगुजा की मिट्टी में पैदा हुए बच्चे के मुंह से निकली ‘सरगुजिहा’ बोली किसी सभ्य समाज के लिए खतरा है? अंबिकापुर के एक रसूखदार स्कूल ने एक 4 साल के मासूम को यह कहकर ठुकरा दिया कि उसकी बोली ‘बड़े घरों के बच्चों’ को बिगाड़ देगी। लेकिन इस अहंकार की उम्र ज्यादा लंबी नहीं थी। आज उस मासूम की जीत हुई है और उस मानसिकता की हार, जो अपनी ही जड़ों को छोटा समझती है।
‘बड़े घर के बच्चे’ और वह कड़वा सच
मामला सरगुजा के ‘स्वरंग एकेडमी’ का है। यहाँ एक मासूम बच्चे का दाखिला सिर्फ इसलिए रोक दिया गया क्योंकि वह स्थानीय सरगुजिहा बोली बोलता था। स्कूल प्रबंधन का तर्क इतना शर्मनाक था कि कोई भी स्वाभिमानी नागरिक भड़क जाए। उनका मानना था कि अगर वह बच्चा स्कूल में पढ़ेगा, तो उसकी बोली सुनकर ‘अभिजात वर्ग’ के बच्चे भी वैसी ही भाषा बोलने लगेंगे। यह न केवल Right to Education (RTE) का उल्लंघन था, बल्कि हमारी सांस्कृतिक पहचान पर एक सीधा हमला था।
दूसरों को ‘गंवार’ कहने वाले खुद ‘अवैध’ निकले

जब यह मामला गरमाया और CG Scoop सहित अन्य मीडिया माध्यमों ने इसे प्रमुखता से उठाया, तब प्रशासन हरकत में आया। कलेक्टर अजीत वसंत के निर्देश पर जब शिक्षा विभाग की टीम जांच करने पहुंची, तो एक और बड़ा खुलासा हुआ। जो स्कूल अपनी ‘क्लास’ और ‘हाई-फाई’ होने की दुहाई देकर एक बच्चे को दुत्कार रहा था, उसके पास खुद स्कूल चलाने की वैध मान्यता (Recognition) तक नहीं थी। पहले तो प्रिंसिपल ने आरोपों को निराधार बताया, लेकिन जब अधिकारियों ने कागजात मांगे, तो उन्होंने अपनी गलती स्वीकार कर ली।
जब सिस्टम ने सिखाया ‘महतारी बोली’ का सम्मान

इस पूरे मामले में प्रशासन का रुख बेहद सख्त रहा। जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) दिनेश कुमार झा ने बताया कि जांच टीम ने पाया कि स्कूल ने New Education Policy (NEP) के उन नियमों की धज्जियां उड़ाई हैं, जो प्राथमिक शिक्षा में मातृभाषा को बढ़ावा देने की बात करते हैं। कलेक्टर के आदेश पर स्कूल के संचालन को तत्काल स्थगित कर दिया गया और ₹1 लाख का भारी जुर्माना लगाया गया। पूर्व डिप्टी सीएम टी.एस. सिंहदेव ने भी इसकी सराहना करते हुए कहा कि स्थानीय बोली के प्रति हीन भावना रखने वाले संस्थानों को समाज में कोई जगह नहीं मिलनी चाहिए।
क्या शिक्षा का मतलब अपनी जड़ों को भूल जाना है?
आज सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या हम ऐसे स्कूलों को अपनी पीढ़ी सौंप रहे हैं जो उन्हें अपनी ही संस्कृति से नफरत करना सिखाते हैं? अगर छत्तीसगढ़ के स्कूलों में ही ‘छत्तीसगढ़ी’ और ‘सरगुजिहा’ को हीन भावना से देखा जाएगा, तो हमारी आने वाली पीढ़ी अपनी पहचान पर गर्व कैसे करेगी? क्या ‘बड़े घर’ का पैमाना अब भाषा तय करेगी, संस्कार नहीं?
एक मासूम की जीत और बदलती हवा के संकेत
इस सख्त कार्रवाई का असर दिखने लगा है। सरगुजा के अन्य निजी स्कूलों की भी अब बारीकी से जांच शुरू हो गई है। लेकिन इस कहानी का सबसे खूबसूरत मोड़ तब आया, जब एक अन्य निजी स्कूल ने उस मासूम बच्चे की प्रतिभा को समझा। उस स्कूल ने बच्चे को ‘फ्री एडमिशन’ देकर न केवल उसे सहारा दिया, बल्कि यह भी साबित किया कि शिक्षा का असली उद्देश्य इंसान बनाना है, भाषा के आधार पर दीवारें खड़ी करना नहीं।
पहचान के साथ अब समझौता नहीं होगा
सरगुजा की यह घटना उन सभी शिक्षण संस्थानों के लिए एक चेतावनी है जो आधुनिकता के नाम पर सांस्कृतिक गुलामी परोस रहे हैं। ‘स्वरंग स्कूल’ पर लगा ताला दरअसल उस सोच पर ताला है जो सरगुजिहा को ‘पिछड़ों की भाषा’ समझती थी। यह जीत उस हर बच्चे की है जिसे उसकी भाषा या पृष्ठभूमि के आधार पर कमतर आंका जाता है। सरगुजा ने बता दिया है—हमारी बोली, हमारा गौरव है।










