दतिया: सस्पेंशन के विरोध में कलेक्टर ऑफिस का घेराव करने पहुंचे पटवारियों को दतिया कलेक्टर स्वप्निल वानखड़े ने बुधवार को ऐसी खरी-खोटी सुनाई कि माहौल गर्म हो गया। कलेक्टर ने साफ शब्दों में कह दिया कि नेताओं के सहारे प्रशासन पर दबाव बनाने की कोशिश किसी कीमत पर बर्दाश्त नहीं की जाएगी। चेतावनी भरे लहजे में उन्होंने कहा – “आपको क्या लगता है 60-70 लोग आकर खड़े हो जाएंगे तो मैं दब जाऊंगा? ऐसा नहीं होगा। भगवान मेरे साथ है, माई मेरे साथ है।”
झुंड बनाकर आना दबाव बनाने की कोशिश: दतिया कलेक्टर
कलेक्टर ने दो टूक कहा कि अगर किसी मुद्दे पर बात करनी थी तो तीन-चार प्रतिनिधि आ सकते थे। बार-बार 60-70 लोगों का झुंड बनाकर आना न सिर्फ गलत है, बल्कि जानबूझकर प्रशासन पर दबाव बनाने की कोशिश है। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर 15 दिन के भीतर दूसरी बार इतनी बड़ी संख्या में आने की जरूरत क्या थी। इसी दौरान पीएम किसान योजना और खाद वितरण में लापरवाही को लेकर भी कलेक्टर ने पटवारियों को जमकर लताड़ा।
कलेक्टर का साफ कहना था – पटवारी का काम कलेक्टर पर दबाव बनाना नहीं है। जब प्रशासन ने सख्ती दिखाई और एडीएम (अपर कलेक्टर) ने दबाव बनाया, तब फिर से 60-70 लोग इकट्ठा होकर पहुंच गए, ये तरीका गलत है।
वायरल वीडियो पर सफाई, “मेरे अकाउंट से नहीं था”
सोशल मीडिया पर वायरल हुए वीडियो को लेकर भी कलेक्टर ने स्थिति स्पष्ट की। उन्होंने कहा कि यह वीडियो उनके आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट पर नहीं था। न उन्होंने इसे वायरल करने की कोशिश की और न ही यह उनके वीडियोग्राफर ने रिकॉर्ड किया। कलेक्टर ने कहा कि बात करनी है तो सीधे, व्यक्तिगत रूप से आकर की जा सकती है। इस तरह झुंड बनाकर आना अवैधानिक (कानून के खिलाफ) भी है और जनता के साथ धोखा भी।
“मैं पैसों के लिए नहीं, जनता के लिए काम करता हूं”
कलेक्टर स्वप्निल वानखड़े इस दौरान भावुक भी नजर आए। उन्होंने कहा – “मैं पैसों के लिए काम नहीं करता, हम सब जनता के लिए काम करते हैं।”
भावुक लहजे में उन्होंने रोज की हकीकत गिनाई – कोई अपनी मां खो चुका है, किसी की बहन या बेटा नहीं रहा, किसी को पांच साल से वृद्धा पेंशन नहीं मिली क्योंकि आधार में अंगूठा नहीं लग पा रहा। कलेक्टर ने कहा कि जब ये दर्द सामने दिखता है, तो गुस्सा भी आता है और कार्रवाई भी होती है।
पटवारियों का पक्ष: “मेडिकल ग्वालियर का, बुलाया दतिया”
एक मीडिया रिपोर्ट के अनुसार पटवारियों ने भी अपना तर्क रखा है। उनका कहना है कि इंदरगढ़ में एक पटवारी को सस्पेंड किया गया, जिसके बाद तहसीलदार ने पत्र जारी कर दतिया से मेडिकल पेश करने को कहा, जबकि संबंधित पटवारी ने ग्वालियर में इलाज कराया था।
इस पर कलेक्टर ने कहा कि यह मामला उनके संज्ञान में नहीं है। अगर बैठकर बातचीत की जाए, तो स्थिति साफ हो सकती है। सीधी बात – टेबल पर बात होगी तो हल निकलेगा, सड़क पर झुंड बनाकर नहीं।
कुल मिलाकर
दतिया में यह पूरा घटनाक्रम सिर्फ एक सस्पेंशन का मामला नहीं है। यह सिस्टम, दबाव की राजनीति और आम जनता की पीड़ा – तीनों के टकराव की कहानी है। कलेक्टर का रुख सख्त है, पटवारियों की नाराजगी भी सामने है, लेकिन सवाल वही है – क्या बातचीत का रास्ता छोड़कर दबाव का रास्ता सही है? जवाब फिलहाल प्रशासन के तेवरों में साफ दिख रहा है।








