बिलासपुर: छत्तीसगढ़ की न्याय व्यवस्था से जुड़ा एक अहम फैसला सामने आया है, जो महिलाओं की गरिमा और सार्वजनिक व्यवहार की सीमा को साफ तौर पर परिभाषित करता है। यह मामला स्कूल से लौट रही एक छात्रा से जुड़े आरोपों पर आधारित है, जिस पर हाई कोर्ट ने विस्तार से विचार किया।
हाथ पकड़ना और खींचना बना अपराध
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने माना कि किसी महिला का हाथ पकड़कर उसे अपनी तरफ खींचना और “I Love You” कहना उसकी मर्यादा का उल्लंघन है। कोर्ट ने कहा कि खास तौर पर ग्रामीण इलाकों में किसी युवक का ऐसा व्यवहार बेहद आपत्तिजनक माना जाएगा।
स्कूल से लौटते वक्त हुई थी घटना
बताया जा रहा है कि यह घटना उस समय की है जब छात्रा अपनी छोटी बहन और एक सहेली के साथ स्कूल से घर लौट रही थी। इसी दौरान आरोपी ने उसका हाथ पकड़कर खींचा और कथित तौर पर “I Love You” कहा। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, डर के कारण छात्रा पास ही मौजूद एक मजार के अंदर चली गई थी।
आरोपी की उम्र और दलीलें
इस मामले में आरोपी की उम्र घटना के वक्त 19 साल बताई जा रही है। आरोपी की ओर से कोर्ट में यह तर्क दिया गया कि “I Love You” कहना पॉक्सो एक्ट के तहत यौन उत्पीड़न नहीं माना जाना चाहिए। यह भी दावा किया गया कि निचली अदालत ने तथ्यों को गलत तरीके से देखा।
पॉक्सो पर राहत, IPC में दोष बरकरार
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, बिलासपुर हाई कोर्ट ने पाया कि पॉक्सो एक्ट के तहत आरोपी की दोषसिद्धि टिकाऊ नहीं है, क्योंकि यह साबित नहीं हो सका कि घटना के दिन पीड़िता नाबालिग थी। हालांकि, कोर्ट ने यह भी साफ किया कि आईपीसी की धारा 354 के तहत आरोपी को दोषी ठहराने में निचली अदालत से कोई गलती नहीं हुई।
कोर्ट की टिप्पणी क्या कहती है
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि आरोपी का कृत्य महिला की गरिमा को ठेस पहुंचाने के इरादे से किया गया था, इसलिए यह आईपीसी की धारा 354 के दायरे में आता है। कोर्ट के मुताबिक, इस तरह का व्यवहार किसी भी सूरत में हल्का नहीं माना जा सकता।
तीन साल से घटाकर एक साल की सजा
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, हाई कोर्ट ने निचली अदालत के दोषसिद्धि के फैसले को बरकरार रखा, लेकिन सजा में राहत दी। आरोपी की सजा तीन साल से घटाकर एक साल कर दी गई है।
फैसले से क्या संकेत निकलता है
इस पूरे मामले को लेकर यह माना जा रहा है कि अदालत ने सार्वजनिक जगहों पर महिलाओं के साथ व्यवहार की सीमाएं स्पष्ट करने की कोशिश की है। बिना कोई अंतिम फैसला सुनाए, इतना जरूर कहा जा रहा है कि यह फैसला महिला गरिमा से जुड़े मामलों में एक अहम संदर्भ के तौर पर देखा जा रहा है।








