सरगुजा/अंबिकापुर: अंबिकापुर के लक्ष्मी नारायण अस्पताल के बाहर चल रहे एक प्रदर्शन के दौरान कवरेज कर रहे पत्रकार सुशील कुमार बखला पर जानलेवा हमला कर दिया गया। हैरानी की बात यह है कि यह पूरी घटना भारी पुलिस बल और कोतवाली टीआई की मौजूदगी में हुई। घटना से आक्रोशित पत्रकारों ने कोतवाली थाने का घेराव कर घंटों धरना प्रदर्शन किया, जिसके बाद पुलिस ने तीन नामजद आरोपियों के खिलाफ गंभीर धाराओं में मामला दर्ज किया है।
पुलिस के सामने ‘गुंडागर्दी’: मोबाइल छीना और की मारपीट
अस्पताल के बाहर ट्रांसफार्मर हटाने की मांग को लेकर क्षेत्रवासी और भाजपा के कुछ नेता प्रदर्शन कर रहे थे। इसी दौरान शाम को माहौल उग्र हो गया और दो पक्षों में मारपीट शुरू हो गई।
पत्रकार पर हमला: जब पत्रकार सुशील कुमार बखला इस घटना का वीडियो बना रहे थे, तभी भीड़ में मौजूद कुछ युवकों ने उनका मोबाइल छीन लिया और उनके साथ मारपीट शुरू कर दी। बीच-बचाव करने आए अन्य पत्रकारों को भी चोटें आईं।
पुलिस की भूमिका पर सवाल: पीड़ित पत्रकार ने बताया कि हमले के वक्त पुलिस मूकदर्शक बनी रही और पीछे हट गई, जिससे हमलावरों के हौसले बुलंद हो गए।
कोतवाली में ‘इंसाफ’ का धरना: गूंजे पुलिस और सत्ता पक्ष के खिलाफ नारे
घटना की खबर फैलते ही सरगुजा प्रेस क्लब के बैनर तले जिले भर के पत्रकार कोतवाली थाने पहुंच गए।
आक्रोश: पत्रकारों ने थाने के गेट पर बैठकर ‘पुलिस प्रशासन मुर्दाबाद’ और ‘भाजपा मुर्दाबाद’ के नारे लगाए। प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे नेताओं का संबंध सत्ता पक्ष से होने के कारण पत्रकारों में भारी नाराजगी देखी गई।
राजनीतिक समर्थन: पत्रकारों के समर्थन में पूर्व डिप्टी सीएम के पुत्र आदितेश्वर शरण सिंहदेव, कांग्रेस जिलाध्यक्ष और सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधि भी थाने पहुंचे। आदितेश्वर शरण सिंहदेव ने इसे लोकतंत्र के लिए दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति बताया।
इन धाराओं के तहत दर्ज हुआ अपराध
देर रात एडिशनल एसपी और सीएसपी ने मारपीट का वीडियो देखने के बाद पत्रकारों की शिकायत पर कड़ी कार्रवाई का आश्वासन दिया। पुलिस ने आरोपी अरुणेंद्र प्रताप सिंह, आकाश सिंह और बडू सिंह के खिलाफ निम्नलिखित धाराओं में मामला दर्ज किया है:
भारतीय न्याय संहिता (BNS): धारा 296, 351 (2), 115 (2), और 3 (5)।
एट्रोसिटी एक्ट: धारा 3-1 (R-S) और 3(2) (V)।
विवाद की जड़: अस्पताल VS प्रदर्शनकारी
लक्ष्मी नारायण अस्पताल के बाहर रिहायशी इलाके में लगाए गए ट्रांसफार्मर को हटाने की मांग को लेकर सुबह से गहमागहमी चल रही थी। शाम होते-होते अस्पताल प्रबंधन और प्रदर्शनकारियों के बीच विवाद खूनी संघर्ष में बदल गया। इसी हिंसक मोड़ को कवर करने के दौरान पत्रकारों को निशाना बनाया गया।
एक पत्रकार पर पुलिस की मौजूदगी में हमला होना कानून-व्यवस्था की पोल खोलता है। सत्ता की हनक में चूर प्रदर्शनकारियों ने न केवल कानून को ठेंगा दिखाया, बल्कि सूचना के अधिकार पर भी हमला किया। बीएनएस और एट्रोसिटी एक्ट जैसी सख्त धाराओं में एफआईआर दर्ज होना पत्रकारों की एकता की जीत है, लेकिन आरोपियों की तत्काल गिरफ्तारी और मूकदर्शक बनी पुलिस पर कार्रवाई होना अभी बाकी है।









