एक मासूम बच्चे का जन्मदिन, घर में बजते गाने और खुशियों का माहौल… किसी ने नहीं सोचा था कि चंद घंटों बाद इसी घर का मुखिया अस्पताल के बिस्तर पर आखिरी सांसें गिन रहा होगा। जशपुर के फरसाटोली गांव में हुई मुरली राम यादव की मौत सिर्फ एक क्राइम रिपोर्ट नहीं, बल्कि समाज के भीतर पनपते उस हिंसक आक्रोश की गवाही है, जहां सगे रिश्ते ही
जान लेने पर उतारू हो जाते हैं।
आधी रात का वो विवाद जिसने उजाड़ दिया हंसता-खेलता परिवार
30 मार्च की रात करीब 11 बजे, जब पूरा गांव सो रहा था, 40 वर्षीय मुरली राम यादव शराब के नशे में अपनी पत्नी सोनिया के मायके पहुँचा। वहां पहले से ही कड़वाहट और पुरानी रंजिश की आग सुलग रही थी। देखते ही देखते मुरली का विवाद उसके छोटे साले शिवकुमार यादव और बड़े साले की पत्नी मिथिला यादव से शुरू हो गया। बात गाली-गलौज से बढ़कर खूनी संघर्ष तक पहुँच गई। दोनों आरोपियों ने मिलकर मुरली को जमीन पर पटका और लात-घूंसों से उसकी छाती और शरीर पर इतने वार किए कि वह अधमरा हो गया।
साले का गुस्सा और भाभी के हाथ का वो घातक डंडा
पुलिस की तफ्तीश में सामने आया कि विवाद के दौरान मिथिला यादव ने हाथ में डंडा थाम लिया और मुरली पर ताबड़तोड़ हमले किए। ये वार इतने घातक थे कि मुरली के सीने के अंदरूनी अंगों में गहरी चोटें आईं। जख्मी हालत में मुरली किसी तरह अपने घर पहुँचा, लेकिन अगले दिन उसकी हालत बिगड़ने लगी। उसे सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र कोतबा ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने स्थिति गंभीर देखते हुए उसे ओडिशा के सुंदरगढ़ रेफर कर दिया। 4 अप्रैल को इलाज के दौरान उसकी सांसें थम गईं और पोस्टमार्टम रिपोर्ट ने पुष्टि कर दी कि मौत की वजह सीने में लगी गंभीर चोट थी।
प्रशासनिक लाचारी: क्या सरहद पार ही बचती है छत्तीसगढ़ के मरीजों की जान?
इस घटना ने जशपुर की स्वास्थ्य व्यवस्था पर भी गहरा सवाल खड़ा कर दिया है। छत्तीसगढ़ का एक नागरिक घायल होता है, लेकिन उसे इलाज के लिए पड़ोसी राज्य ओडिशा के सुंदरगढ़ मेडिकल कॉलेज पर निर्भर होना पड़ता है। सवाल यह है कि अगर स्थानीय स्तर पर ही विशेषज्ञ डॉक्टर और आधुनिक मशीनें उपलब्ध होतीं, तो क्या इलाज में होने वाली देरी को कम करके मुरली की जान बचाई जा सकती थी? रेफरल का यह खेल अक्सर मरीजों के लिए ‘डेथ वारंट’ साबित होता है।
दहशत में फरसाटोली: प्रेम विवाह से शुरू हुई कहानी का खौफनाक अंत
गांव के गलियारों में चर्चा है कि मुरली और सोनिया के प्रेम विवाह को लेकर ससुराल पक्ष में लंबे समय से गुस्सा था। जमीन पर स्थिति यह है कि आज लोग अपनों से बात करने में भी डरने लगे हैं। ग्रामीण समझ नहीं पा रहे हैं कि जिस घर से शादी का रिश्ता जुड़ा, वहीं से मौत का सामान कैसे निकल सकता है। इस हत्या ने गांव के सामाजिक ताने-बाने को झकझोर कर रख दिया है, जहां आपसी संवाद की जगह अब हिंसा और डंडे ने ले ली है।
पुलिस की कार्रवाई और कानून के शिकंजे में कातिल रिश्ते
मामले की गंभीरता को देखते हुए कोतबा चौकी पुलिस ने अपराध क्रमांक 38/2026 के तहत बीएनएस (BNS) की धारा 103(1) और 3(5) के तहत मामला दर्ज किया। पुलिस की सक्रियता के कारण दोनों आरोपी—शिवकुमार और मिथिला—अब सलाखों के पीछे हैं। घटना में इस्तेमाल किया गया डंडा भी बरामद कर लिया गया है। पुलिस का दावा है कि उन्होंने त्वरित कार्रवाई कर आरोपियों को न्यायिक रिमांड पर भेज दिया है, लेकिन क्या जेल जाने से समाज के भीतर बैठा यह हिंसक डर खत्म हो पाएगा?
जब तक नशा और गुस्सा हावी रहेगा, तब तक न्याय अधूरा है
मुरली राम यादव की मौत हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या कानून का खौफ खत्म हो चुका है? साले और भाभी का अपने ही जीजा पर ऐसा प्रहार करना बताता है कि रिश्तों की मर्यादा नशे और गुस्से के आगे घुटने टेक चुकी है। पुलिस ने आरोपियों को पकड़कर अपना फर्ज निभाया है, लेकिन असल न्याय तब होगा जब समाज में ऐसी हिंसक प्रवृत्तियों को रोकने के लिए प्रशासनिक और सामाजिक स्तर पर कोई ठोस पहल होगी। वरना, आज मुरली गया है, कल कोई और इस आक्रोश की भेंट चढ़ेगा।










