सुकमा: बस्तर के सुदूर अंचलों में अक्सर कहा जाता है कि विकास की राह बीहड़ जंगलों और ऊंचे पहाड़ों से होकर गुजरती है। लेकिन जब नेतृत्व जमीनी हो, तो बदलाव की शुरुआत वहीं से होती है जहां उम्मीद सबसे कम नजर आती है। शुक्रवार को सुकमा के नक्सल प्रभावित इलाकों के दौरे पर निकले कलेक्टर अमित कुमार ने संवेदनशीलता की एक ऐसी मिसाल पेश की, जिसकी चर्चा अब पूरे प्रदेश में हो रही है।
धूप में महुआ चुनती बच्ची के लिए रुकीं गाड़ियां
कलेक्टर अमित कुमार जिला पंचायत सीईओ मुकुन्द ठाकुर के साथ मारोकी, मानकापाल, परिया और कुचारास जैसे संवेदनशील गांवों के निरीक्षण पर थे। इसी दौरान सड़क किनारे पेड़ों के नीचे कुछ बच्चे तपती दुपहरी में महुआ बीनते नजर आए। कलेक्टर ने तुरंत अपना काफिला रुकवा दिया और सीधे खेतों के बीच उस नन्हीं बच्ची के पास पहुंच गए।
मंगली की आंखों में थी मजबूरी, कलेक्टर ने दिया हौसला
बातचीत में बच्ची ने अपना नाम मड़कामी मंगली बताया। जब कलेक्टर ने उससे स्कूल न जाने का कारण पूछा, तो गरीबी और पारिवारिक मजबूरियों की कहानी सामने आई। जागरूकता की कमी के कारण मंगली पढ़ाई छोड़ अपने माता-पिता के साथ काम में हाथ बंटा रही थी। कलेक्टर सिर्फ बातचीत कर आगे नहीं बढ़े, बल्कि मंगली के घर तक पहुंच गए और उसके माता-पिता से सीधा संवाद किया।
मौके पर ही दाखिले का आदेश
कलेक्टर की समझाइश का असर यह हुआ कि मंगली के माता-पिता उसे दोबारा स्कूल भेजने को तैयार हो गए। कलेक्टर ने मौके पर ही शिक्षा विभाग के अधिकारियों को निर्देश दिए:
मड़कामी मंगली का तुरंत स्कूल में दाखिला कराया जाए।
वहीं मौजूद एक अन्य बालक माड़वी देवा, जो स्कूल से दूर था, उसे भी शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ा जाए।
दोनों बच्चों को आवासीय विद्यालय में भर्ती कराया जाए ताकि उनकी पढ़ाई में कोई रुकावट न आए।
“कलम थामेंगे हाथ, तभी होगा सुकमा का विकास”
कलेक्टर अमित कुमार ने स्पष्ट संदेश देते हुए कहा, “हमारा प्रयास है कि सुकमा का कोई भी बच्चा शिक्षा से वंचित न रहे। अगर बच्चे मजबूरी में स्कूल छोड़ रहे हैं, तो प्रशासन की जिम्मेदारी है कि उनके घर तक जाए। महुआ बीनने वाले ये छोटे हाथ जब कलम थामेंगे, तभी सुकमा का असली विकास संभव होगा।”
ड्रॉपआउट बच्चों की बनेगी सूची
जिला पंचायत सीईओ मुकुन्द ठाकुर ने अधिकारियों को निर्देशित किया है कि क्षेत्र के सभी ड्रॉपआउट बच्चों की सूची तैयार की जाए। जिले में अब ‘पालक-शिक्षक’ बैठकें और घर-घर जाकर बच्चों को स्कूल लाने का अभियान एक मिशन के रूप में चलाया जाएगा। ग्रामीणों के लिए यह दृश्य भावुक करने वाला था कि जिले का सबसे बड़ा अधिकारी खुद उनके घर पहुंचकर बच्चों के भविष्य की चिंता कर रहा है।









