दंतेवाड़ा/रायपुर : अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर राजधानी रायपुर में आयोजित ‘लखपति दीदी संवाद’ कार्यक्रम में दंतेवाड़ा की बीमबती नाग आकर्षण का केंद्र रहीं। कभी तंगहाली में जीवन बिताने वाली बीमबती आज पूरे प्रदेश में “फिनायल वाली दीदी” के नाम से मशहूर हो चुकी हैं। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के साथ भोजन करते हुए उन्होंने अपनी सफलता का सफर साझा किया और बताया कि कैसे ‘बिहान’ योजना ने उनकी जिंदगी की तस्वीर बदल दी।
फिनायल के कारोबार से 4 लाख का मुनाफा
जिला प्रशासन और राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (बिहान) के सहयोग से बीमबती ने फिनायल बनाने का काम शुरू किया था। अपनी मेहनत और लगन के दम पर उन्होंने इसे एक सफल बिजनेस मॉडल में तब्दील कर दिया है।
बड़ी सफलता: बीमबती अब तक 10 लाख रुपये मूल्य का फिनायल बेच चुकी हैं।
शुद्ध आय: इस कारोबार से उन्हें 4 लाख रुपये से अधिक का मुनाफा हुआ है, जिससे उनकी आर्थिक स्थिति पहले से कहीं ज्यादा मजबूत हुई है।
सरकारी विभागों में सप्लाई: उनके द्वारा बनाए गए फिनायल की सबसे ज्यादा खपत जिले के विभिन्न शासकीय कार्यालयों में हो रही है।
सिर्फ फिनायल ही नहीं, गाड़ी चलाने में भी माहिर
बीमबती की बहुमुखी प्रतिभा का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि वे फिनायल निर्माण के साथ-साथ सिलाई का काम भी करती हैं। इतना ही नहीं, वे एक ‘कैडर’ के रूप में अन्य महिलाओं को प्रशिक्षण देने और वाहन चलाने जैसे काम भी बखूबी कर रही हैं। वे दंतेवाड़ा की उन ग्रामीण महिलाओं के लिए प्रेरणा बन चुकी हैं, जो आत्मनिर्भर बनने का सपना देखती हैं।
क्या है ‘लखपति दीदी’ और ‘बिहान’ का जादू?
मुख्यमंत्री के साथ संवाद के दौरान इन योजनाओं की ताकत भी नजर आई:
लखपति दीदी योजना: इसका लक्ष्य स्वयं सहायता समूह (SHG) से जुड़ी महिलाओं की सालाना आय को 1 लाख रुपये से ऊपर ले जाना है। इसमें कौशल विकास और कम ब्याज पर ऋण की सुविधा मिलती है।
बिहान मिशन: छत्तीसगढ़ का यह मिशन ‘वोकल फॉर लोकल’ को बढ़ावा देते हुए ग्रामीण महिलाओं को संगठित कर उन्हें स्वरोजगार से जोड़ता है।
बीमबती नाग जैसी महिलाओं की सफलता यह साबित करती है कि बस्तर और दंतेवाड़ा जैसे इलाकों में बदलाव की बयार बह रही है। “फिनायल वाली दीदी” जैसे नाम मिलना इस बात का प्रतीक है कि अब ग्रामीण महिलाओं की पहचान उनके काम से हो रही है। हालांकि, इस मॉडल को और सफल बनाने के लिए सरकार को इन स्व-सहायता समूहों के उत्पादों की ‘मार्केटिंग और ब्रांडिंग’ पर और अधिक ध्यान देना होगा, ताकि बीमबती जैसी हजारों दीदियां केवल सरकारी सप्लाई तक सीमित न रहकर खुले बाजार में भी बड़ी कंपनियों को टक्कर दे सकें।









