मनेंद्रगढ़-चिरमिरी-भरतपुर: अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर जहाँ दुनिया कागजी चर्चाओं में मशगूल है, वहीं चिरमिरी की कोयला खदानों से एक ऐसी तस्वीर सामने आई है जो रोंगटे खड़े कर देती है। यहाँ की ओपनकास्ट माइंस में महिलाएं न केवल भारी भरकम मशीनें दौड़ा रही हैं, बल्कि उस खतरनाक बारूद को भी अपने हाथों से बिछा रही हैं, जिससे कइयों के पैर कांप जाते हैं। ‘ब्लास्टिंग’ जैसे जोखिम भरे काम को ये महिलाएं पूरी निडरता और तकनीकी बारीकी के साथ अंजाम दे रही हैं।
खतरनाक ब्लास्टिंग और मशीनों की स्टेयरिंग
कोयला खदानों में ब्लास्टिंग की प्रक्रिया बेहद जटिल होती है। पहले गहरे छेद करना, फिर उनमें सावधानी से बारूद भरना और फिर धमाका—जरा सी चूक जानलेवा साबित हो सकती है। लेकिन यहाँ की महिलाएं इस काम को अपनी रोजमर्रा की ड्यूटी का हिस्सा मान चुकी हैं। माइंस मैनेजर संतोष कुमार खुद तस्दीक करते हैं कि जिन भारी मशीनों को चलाना पुरुषों के लिए भी चुनौती होता है, उन्हें यहाँ की महिलाएं बड़ी सहजता से ऑपरेट कर रही हैं।
मजबूरी को बनाया ढाल, अब हैं बेखौफ
यहाँ काम करने वाली हीरा देवी और श्रीमती बिट्टो जैसी महिलाओं का मानना है कि आज के दौर में महिला-पुरुष का अंतर खत्म हो चुका है। खदान में काम करने वाली इन जांबाज महिलाओं में से कई ऐसी हैं, जिन्होंने अपनों को खोने के बाद अनुकंपा नियुक्ति के जरिए यह रास्ता चुना। पिता या पति की असमय मृत्यु के बाद घर का चूल्हा जलाने की जिम्मेदारी जब कंधों पर आई, तो उन्होंने अंधेरी और गहरी खदानों को ही अपना कार्यक्षेत्र बना लिया।
करोड़ों की संपत्ति और सुरक्षा का जिम्मा
सिर्फ कोयला निकालना ही नहीं, खदानों में तैनात महिला सुरक्षा गार्ड्स करोड़ों रुपये की मशीनों और संसाधनों की पहरेदारी भी कर रही हैं। कल्पना अधिकारी जैसी कर्मी कहती हैं कि यहाँ जितनी भी महिलाएं हैं, वे अपना कार्यभार पूरी ईमानदारी से संभाल रही हैं और आने वाले समय में और भी बेहतर करने का इरादा रखती हैं।
समाज के लिए बनीं मिसाल
चिरमिरी की ये महिलाएं केवल कोयला नहीं निकाल रहीं, बल्कि समाज की उस पुरानी सोच की जड़ें भी खोद रही हैं जो कहती है कि खदानें महिलाओं के लिए नहीं हैं। बारूद के बीच पसीने से लथपथ इन चेहरों की मुस्कान यह बताने के लिए काफी है कि हौसला मजबूत हो तो पाताल से भी रास्ता निकाला जा सकता है।
चिरमिरी की खदानों में काम करने वाली ये महिलाएं सही मायनों में ‘ग्राउंड जीरो’ की हीरो हैं। अक्सर कॉर्पोरेट दफ्तरों में बैठकर सशक्तिकरण की बातें करना आसान होता है, लेकिन जमीन के नीचे बारूद और भारी मशीनों के बीच काम करना असली साहस है। एसईसीएल (SECL) और प्रशासन को इन महिलाओं की सुरक्षा और उनके स्वास्थ्य के लिए विशेष मेडिकल सुविधाएं और सुरक्षित माहौल सुनिश्चित करना चाहिए, क्योंकि ये केवल श्रमिक नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ के गौरव की प्रतीक हैं।










