धमतरी/मगरलोड: धमतरी जिले के वनांचल गांव सिंगपुर से एक ऐसी कहानी सामने आई है, जो आधुनिक दौर के बड़े-बड़े दानवीरों को आईना दिखाती है। यहां रहने वाली 50 वर्षीय खम्मन बाई कमार खुद कभी स्कूल नहीं गईं, लेकिन आज वे गांव के बच्चों के लिए ‘शिक्षा की मशाल’ बन गई हैं। महुआ बीनकर और बांस की टोकरी बेचकर पाई-पाई जोड़ने वाली इस आदिवासी महिला ने सरकारी स्कूल के बच्चों के लिए अपनी कमाई से कंप्यूटर और स्मार्ट टीवी दान किया है।
पेट काटकर बच्चों के लिए जुटाया ‘ज्ञान’
अत्यंत पिछड़ी कमार जनजाति से आने वाली खम्मन बाई एक छोटी सी झोपड़ी में रहती हैं। साल 2008 में पति के निधन के बाद उन्होंने अकेले दम पर दो बेटों और एक बेटी को पाला। वे सुबह अंधेरे में उठकर जंगल से महुआ बीनती हैं, तेंदूपत्ता तोड़ती हैं और दिन भर बांस की टोकरी बुनती हैं। इस हाड़तोड़ मेहनत से जो भी आमदनी होती है, उसका एक हिस्सा वे चुपचाप स्कूल की जरूरतों के लिए अलग रख देती हैं।
दादी का तोहफा देख खिले बच्चों के चेहरे
स्वामी आत्मानंद उत्कृष्ट हिंदी विद्यालय, सिंगपुर के बच्चे अब कंप्यूटर पर पढ़ाई कर रहे हैं। बच्चों के लिए खम्मन बाई सिर्फ एक ग्रामीण महिला नहीं, बल्कि वो ‘जादुई दादी’ हैं जो कभी किताबें, कभी बाल्टी तो कभी कंप्यूटर लेकर स्कूल पहुंच जाती हैं। खम्मन बाई कहती हैं, “मैं पढ़ी-लिखी नहीं हूँ, पर चाहती हूँ कि आने वाली पीढ़ी वो अंधेरा न देखे जो मैंने देखा। जो पैसा मेरे पेट भरने के बाद बचता है, उसे मैं बच्चों की पढ़ाई पर लगा देती हूँ।”
प्रशासन ने माना लोहा, कलेक्टर ने कहा- “देश के लिए मिसाल”
धमतरी कलेक्टर अबिनाश मिश्रा ने खम्मन बाई के जज्बे को सलाम किया है। उन्होंने कहा कि एक कमार महिला द्वारा स्मार्ट टीवी और कंप्यूटर डोनेट करना पूरे देश के लिए महिला सशक्तिकरण का सबसे बड़ा उदाहरण है। कलेक्टर ने यह भी भरोसा दिलाया कि सिंगपुर में कॉलेज और आईटीआई खोलने का प्रस्ताव शासन को भेज दिया गया है, ताकि बेटियों को उच्च शिक्षा के लिए दूर न जाना पड़े।
“2 साल बाद दूंगी एक और बड़ा सरप्राइज”
खम्मन बाई के हौसले यहीं खत्म नहीं होते। उन्होंने मुस्कुराते हुए एलान किया है कि वे अगले 2 साल में स्कूल के लिए एक और बड़ा तोहफा तैयार कर रही हैं, जिसका खुलासा वे वक्त आने पर ही करेंगी। उनकी बस एक ही मांग है— सरकार उनके गांव में एक कॉलेज खोल दे, ताकि गांव की लड़कियों की पढ़ाई बीच में न छूटे।
खम्मन बाई कमार की कहानी यह साबित करती है कि समाज को बदलने के लिए ऊँची डिग्री नहीं, बल्कि ऊँचे इरादों की जरूरत होती है। जहाँ लोग अपनी सुख-सुविधाओं के लिए संघर्ष करते हैं, वहीं एक आदिवासी महिला का अपनी बुनियादी जरूरतों को काटकर स्कूल को ‘स्मार्ट’ बनाना एक मौन क्रांति है। धमतरी प्रशासन को चाहिए कि खम्मन बाई को न केवल सम्मानित करे, बल्कि उनकी इकलौती मांग यानी ‘गांव में कॉलेज’ को प्राथमिकता के आधार पर पूरा करे, ताकि उनकी मेहनत वाकई सार्थक हो सके।










