रायपुर: कल तक जो हाथ घरों में चूल्हा-चौका संभालते थे या दूसरों के बर्तनों से अपनी किस्मत घिसते थे, आज वही हाथ मजबूती से ऑटो की स्टेयरिंग थामकर रायपुर की सड़कों पर सरपट दौड़ रहे हैं। 8 मार्च यानी अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस के मौके पर रायपुर की महिला ऑटो ड्राइवर्स ने यह साबित कर दिया है कि मेहनत और हिम्मत हो, तो कोई भी रास्ता मुश्किल नहीं होता। दूसरों की नौकरी और बंदिशों को पीछे छोड़ ये महिलाएं अब खुद की मर्जी की मालिक बन चुकी हैं।
मंजू और चंपा की कहानी: मजबूरी को बनाया ताकत
रायपुर रेलवे स्टेशन पर ऑटो चलाने वाली मंजू शर्मा बताती हैं कि वे पहले एक कपड़ा दुकान में काम करती थीं। वहां न तो ज्यादा पैसा था और न ही समय की आजादी। 11 साल पहले उन्होंने ऑटो संभालना शुरू किया और आज वे गर्व से कहती हैं, “अब मान-सम्मान भी है और अपनी मर्जी से काम करने की आजादी भी।”
वहीं, चंपा महानंद की कहानी थोड़ी अलग है। उन्होंने साल 2016 में अपने पति के कहने पर ऑटो सीखा था। शुरुआत में झिझक थी, लेकिन आज वे न केवल अपने बच्चों को स्कूल छोड़ती हैं, बल्कि घर की आर्थिक स्थिति को भी मजबूती दे रही हैं। चंपा कहती हैं, “पति ने सिखाया तो लगा कि दो पैसा घर आएगा और बच्चों का भविष्य सुधरेगा।”
चुनौतियां कम नहीं: ड्राइवरों का विरोध और यात्रियों से विवाद
यह सफर इतना आसान भी नहीं था। साल 2016 के आस-पास जब इन महिलाओं ने सड़कों पर कदम रखा, तो पुरुष ड्राइवरों ने इनका जमकर विरोध किया। सवारियों के साथ पैसे के लेनदेन को लेकर आज भी कभी-कभी विवाद होता है, कई बार यात्री बिना पैसे दिए ही उतर जाते हैं। लेकिन ये ‘आयरन लेडीज’ अब हर मुश्किल से लड़ना सीख गई हैं। टायर पंचर हो, एक्सीलेटर वायर टूटे या कंट्रोलर जल जाए, ये महिलाएं संघर्ष के साथ आगे बढ़ना जानती हैं।
कमाई और सुकून: “अपनी मर्जी की मालिक हूँ”
स्टेशन पर काम करने वाली एक अन्य महिला ड्राइवर ने बताया कि वे सुबह 10 से शाम 5 बजे तक ऑटो चलाती हैं। पहले वे दूसरों के घरों में खाना बनाती थीं, जहां न समय पर पैसा मिलता था और न सम्मान। अब वे दिन भर में 600 से 1000 रुपये तक कमा लेती हैं। वे कहती हैं, “सबसे अच्छा ई-रिक्शा ही लगता है, क्योंकि मैं अपनी मर्जी की मालिक हूँ। जब मर्जी होती है चलाती हूँ, जब काम होता है घर चली जाती हूँ।”
घर से बाहर निकलने का संदेश
रायपुर रेलवे स्टेशन और प्रमुख चौक-चौराहों पर आज लगभग 60 महिलाएं ऑटो और ई-रिक्शा चलाकर अपनी रोजी-रोटी कमा रही हैं। इन महिलाओं का समाज की अन्य बहनों को सिर्फ एक ही संदेश है— “दूसरों की नौकरी करने या घर में बैठने से अच्छा है कि अपना काम शुरू करें। अपनी मेहनत का पैसा बहुत सुकून देता है।”
रायपुर की ये महिला ऑटो ड्राइवर्स केवल वाहन नहीं चला रहीं, बल्कि समाज की उस दकियानूसी सोच को भी रौंद रही हैं जो कहती है कि कुछ काम सिर्फ पुरुषों के लिए हैं। रेलवे स्टेशन की इन 10 महिलाओं से शुरू हुआ यह कारवां आज 60 तक पहुंच गया है, जो महिला सशक्तिकरण की एक जीती-जागती तस्वीर है। हालांकि, प्रशासन को इन महिला ड्राइवर्स की सुरक्षा और उनके लिए विशेष स्टैंड जैसी सुविधाओं पर ध्यान देना चाहिए, ताकि ‘पिंक इकोनॉमी’ का यह सपना और मजबूती से आगे बढ़ सके।










