बैकुंठपुर (कोरिया): जब पूरा देश भारतीय पंचांग के अनुसार होली की तैयारियों में जुटा है, छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले का एक गांव रंगों में सराबोर हो चुका है। जिला मुख्यालय से महज 12 किलोमीटर दूर स्थित अमरपुर गांव में दशकों पुरानी परंपरा को निभाते हुए मुख्य तिथि से एक सप्ताह पहले ही होली मना ली गई। ढोल-मंजीरों की थाप और फाग गीतों के बीच ग्रामीणों ने जमकर गुलाल उड़ाया।
अनहोनी को टालने के लिए ‘वक्त से पहले’ त्योहार
अमरपुर गांव की इस अनोखी परंपरा के पीछे गहरी आस्था और एक डर छिपा है। गांव के बुजुर्गों और जानकारों के अनुसार, वर्षों पहले गांव में कुछ ऐसी अप्रिय घटनाएं और अनहोनी हुई थीं, जिसने पूरे क्षेत्र को झकझोर कर रख दिया था।
मान्यता: पूर्वजों का मानना था कि यदि निर्धारित तिथि पर होली मनाई गई, तो गांव पर भारी संकट आ सकता है। इसी ‘अनलकी’ साए और अनहोनी को टालने के लिए ग्रामीणों ने तय समय से एक हफ्ते पहले ही होलिका दहन और रंग खेलने की शुरुआत कर दी।
परंपरा का निर्वहन: आज भी गांव के सरपंच लाल मन सिंह और अन्य ग्रामीण इसी श्रद्धा के साथ इस विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं।
देवल्ला में पूजा और फाग का शोर
इस वर्ष जहां कैलेंडर के अनुसार 3 मार्च को होली है, वहीं अमरपुर में उत्सव संपन्न हो चुका है।
सामूहिक आयोजन: गांव में पहले बैठक कर रणनीति बनाई गई, फिर देवल्ला (देव स्थल) में विशेष पूजा-अर्चना की गई। इसके बाद पूरे गांव ने एकजुट होकर जुलूस निकाला।
उत्साह: क्या बच्चे और क्या बुजुर्ग, हर कोई फाग गीतों पर थिरकता नजर आया। ग्रामीण राधिका बताती हैं कि बचपन से ही वे इसी परंपरा को देख रही हैं और यह गांव की सुख-समृद्धि का प्रतीक बन चुका है।
12 किलोमीटर दूर तक चर्चित है ‘अमरपुर की होली’
अमरपुर की यह होली केवल इस गांव तक सीमित नहीं है। आसपास के कई गांवों के लोग इस अनूठी रस्म को देखने और फाग गीतों का आनंद लेने यहां पहुंचते हैं। पारंपरिक वाद्ययंत्रों की गूंज और एक-दूसरे को अबीर लगाने का यह सिलसिला सामाजिक एकता की एक मिसाल पेश करता है।
डिजिटल युग में भी अमरपुर की यह परंपरा आस्था और लोक-संस्कृति के अटूट मेल को दर्शाती है। हालांकि विज्ञान इसे ‘अंधविश्वास’ कह सकता है, लेकिन ग्रामीणों के लिए यह उनकी सामूहिक सुरक्षा और पूर्वजों के प्रति सम्मान का तरीका है। यह विविधता ही छत्तीसगढ़ की ग्रामीण संस्कृति को देशभर में खास बनाती है।









