रायपुर: हसदेव अरण्य में पेड़ों की कटाई का मुद्दा एक बार फिर छत्तीसगढ़ की सियासत में गरमा गया है। पूर्व डिप्टी सीएम टीएस सिंहदेव ने इस मामले पर कड़ा रुख अपनाते हुए दावा किया है कि कांग्रेस शासन के पांच सालों के दौरान हसदेव में एक भी पेड़ की डगाल नहीं कटी। सिंहदेव ने वर्तमान सरकार पर हमला बोलते हुए कहा कि मुख्यमंत्री के शपथ ग्रहण से पहले ही प्रशासन ने सक्रिय होकर कटाई शुरू करवा दी थी।
राजेश अग्रवाल के बयान पर पलटवार
हाल ही में एक निजी चैनल के कार्यक्रम में पर्यटन मंत्री राजेश अग्रवाल ने कहा था कि “जंगल तो कटेगा ही, जब टीएस बाबा नहीं रोक पाए तो मैं क्या रोकूँगा।” इस पर प्रतिक्रिया देते हुए सिंहदेव ने कहा कि राजेश ने अपने परिचित अंदाज में यह बात कही है, लेकिन हकीकत कुछ और है। सिंहदेव ने याद दिलाया कि कांग्रेस सरकार के दौरान जब आंदोलन हुआ और वे खुद ग्रामीणों के बीच पहुंचे, तब तत्कालीन मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने स्पष्ट कहा था कि “बाबा नहीं चाहेंगे तो एक पेड़ भी नहीं कटेगा।”
“गोली चलेगी तो पहले मैं सामने खड़ा रहूँगा”
सिंहदेव ने अपने पुराने वादे को दोहराते हुए कहा कि वे वहां के विधायक और कैबिनेट मंत्री के तौर पर ग्रामीणों के साथ खड़े थे। उन्होंने कहा, “मैंने तब भी कहा था कि अगर आदिवासियों पर गोली चली तो पहली गोली मैं खाऊंगा। यही वजह थी कि हमारे पूरे कार्यकाल में वहां काम रुका रहा और लोगों की भावनाओं का सम्मान किया गया। कांग्रेस ने जनता की राय को कभी अनदेखा नहीं किया।”
रामविचार नेताम के ‘सच’ पर चुटकी
सिंहदेव ने कैबिनेट मंत्री रामविचार नेताम के एक पुराने बयान का हवाला देते हुए कहा कि वे अनजाने में एक बड़ी सच्चाई बोल गए थे। सिंहदेव के मुताबिक, नेताम ने स्वीकार किया था कि अभी सरकार का शपथ ग्रहण भी नहीं हुआ था और प्रशासन ने हसदेव में कटाई शुरू कर दी थी। सिंहदेव ने तंज कसते हुए कहा कि बहुमत आते ही जिस तरह से जंगलों पर कुल्हाड़ी चली, वह बताता है कि वर्तमान सरकार की प्राथमिकताएं क्या हैं।
हसदेव का मुद्दा छत्तीसगढ़ की राजनीति की वह ‘नब्ज’ है जिसे छूते ही करंट दौड़ता है। टीएस सिंहदेव का यह बयान न केवल अपनी सरकार का बचाव है, बल्कि वर्तमान साय सरकार को ‘जनविरोधी’ दिखाने की एक कोशिश भी है। ‘शपथ से पहले कटाई’ वाला तर्क देकर सिंहदेव ने सीधे तौर पर प्रशासनिक जल्दबाजी और सरकार की मंशा पर सवाल उठाए हैं। हालांकि, कोयला संकट और बिजली की जरूरतों के बीच झूलता हसदेव अब केवल पर्यावरण का नहीं, बल्कि साख की लड़ाई बन चुका है।









